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घर क्यों लेट आता हूं

घर क्यों लेट आता हूं वह फरियाद करती है शक भरी नजरों से देखती है अजब गजब के सवाल करती है जान बचती है बहुत मुश्किल से लाख सफाई देने के बाद, वह बेतहाशा मुझसे प्यार करती है

काश उस तरह जिंदगी संवर जाती

 काश उस तरह जिंदगी संवर जाती जिस तरह ख्वाब देखता हूं जब भी कदम उठाता हूं मंजिल की ओर कोई न कोई बाधा उत्पन्न हो जाती है घबराता नहीं हूं यह सोच कर मुश्किलों से होकर खुशियों के रास्ते  निकलते हैं 

सोचा था कि दिल्लगी

सोचा था कि दिल्लगी ना किसी से करेंगे कभी आपको देखकर खुद को रोक नहीं पाया इजहार करने को मैं तड़पता रहा ना जाने क्यों कुछ कह नहीं पाया

तुम्हारी मीठी बातों का वह फसाना मुझे याद आता है

तुम्हारी मीठी बातों का वह फसाना मुझे याद आता है एक छोटी सी बात पर गुस्सा ना मुझे याद आता है फिर कुछ वक्त बाद प्यार जताना याद आता है तुम्हारी वादो का खजाना मुझे याद आता है